सियासत का गीली-बिली अशोक गहलोत के जादूगर से मुख्यमंत्री बनने का सफर

3 मई 1991 को राजस्थान के जोधपुर में जादूगर लक्ष्मण सिंह गहलोत के घर जन्मा एक लड़का कैसे आगे चलकर राजस्थान का मुख्यमंत्री बनता है और जिन्हें राजनीतिक गलियारों का गिली बिली भी कहा जाता है। आज हम बात करेंगे राजस्थान के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  

अशोक गहलोत जोधपुर के एक सामान्य घर में पैदा हुए. पिता लक्ष्मण सिंह  अच्छे जादूगर थे. देश में घूम-घूमकर जादू दिखाते. अशोक भी पिता के साथ घूमे. स्टेज पर जादू भी दिखाया. पढ़ाई में भी ठीक-ठाक ही थे. जिंदगी वैसी ही थी जैसी सामान्य होती है. 12 वीं के बाद जोधपुर की जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया. पढ़ने का शौक था. उसी के फेर में जोधपुर के गांधी शांति प्रतिष्ठान के चक्कर लगाने लगे. यहां गांधी जी का लिखा पढ़ते. गांधी के विचार अच्छे लगे.  यह साल 1971 की बात है जब जोधपुर का एक नौजवान बांग्लादेशी शरणार्थियों के शिविर में काम करते दिखाई दिया था. उसी वक्त देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी शरणार्थियों के कैंप  देखने के लिए आई थी उसी समय उनकी नजर निस्वार्थ भाव से सेवा करते हुए अशोक गहलोत पर पङी तो इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस ज्वाइन करने की बात कही। इस से पहले अशोक गहलोत वर्ष 1968 से 1972 के बीच गाँधी सेवा प्रतिष्ठान के साथ सेवा ग्राम में काम कर चुके थे. जानकार बताते हैं कि सेवा कार्य के भाव ने ही अशोक गहलोत की पहुंच इंदिरा गाँधी  तक कराई थी. इसके बाद अशोक गहलोत ने यूथ कांग्रेस ज्वाइन करके जीवन का पहला चुनाव विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ा जो उनकी पहली चुनाव और हार दोनों ही थी वह चुनाव हार गए, उस वक़्त वह अर्थशास्त्र में एम.ए.  के विद्यार्थी थे. एनएसयूआई  से राजनीति सफर की शुरूआत की और फिर बाद में यूथ कांग्रेस  और सेवा दल से होते हुए कांग्रेस की मुख्य धारा में पहुंचे हैं. अशोक गहलोत  34 साल की उम्र में राजस्थान  प्रदेश के अध्यक्ष बने थे. हमेशा से खादी के परिधान में दिखने वाले अशोक गहलोत  ने साल 1977 में जब पहली बार कांग्रेस  की टिकट पर जोधपुर  से विधानसभा का चुनाव  लड़ा तो उनके पास चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं थे जोधपुर की सरदारपुरा सीट से लड़ने के लिए संजय से टिकट ले आए। उम्र थी 26 साल और पूंजी के नाम पर सिर्फ एक बाइक थी. उसे चार हजार में बेच दिया. जैसे-तैसे करके चुनाव लड़ा. सामने थे जनता पार्टी के माधो सिंह. उनसे 4,329 के अंतर से चुनाव हार गए. लेकिन वह निराश नहीं हुए बल्कि अगले ही दिन उन्हें चुनावी इलाक़े में घूम-घूमकर मतदाताओं  का आभार व्यक्त करते देखा गया. और फिर 1980 के लोकसभा चुनाव में संजय गांधी ने उन्हें जोधपुर सीट से टिकट दिया और वह लगभग 52000 वोटों से विजय हुए। और दिल्ली पहुंच गए.

गहलोत ने पांच बार संसद में जोधपुर का प्रतिनिधित्व किया है. साल 1982 में पहली बार वह इंदिरा गाँधी मंत्रिमंडल में उप-मंत्री बने. और उसी समय से गहलोत की गांधी परिवार से नजदीकी बढ़ने लगी और फिर गहलोत कभी कभी राहुल और प्रियंका को जादू का खेल भी दिखा दिया करते. इस नजदीकी का फायदा मिला. सितंबर 1982 में मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ. इंदिरा मंत्रिमंडल में ले लिए गए. नागरिक उड्डयन मंत्रालय का उप-मंत्री बनाया गया. उम्र थी महज 31 साल.  जब वह उप—मंत्री की शपथ लेने गए तो एक तिपहिया में बैठ कर गए.  बात है 1985 की कैसे एक जादूगर ने हवलदार के दम पर मुख्यमंत्री का काम तमाम कर दिया था इंदिरा गांधी की हत्या के बाद केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी और अशोक गहलोत मंत्री बने रहे उसी समय 1985 में कांग्रेस को राजस्थान विधानसभा चुनाव में 200 में से 113 सीट मिली थी और हरिदेव जोशी मुख्यमंत्री राजस्थान के बने। 1980 से 85 के बीच कांग्रेस के अंदर बहुत उठापटक चल रही थी जिसके कारण राजीव गांधी  सूबे कांग्रेस में अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाहते थे इसलिए राजीव गांधी ने अशोक गहलोत को केंद्र से फिर से राजस्थान जयपुर भेजा प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना के उस समय अशोक गहलोत की उम्र मात्र 34 वर्ष थी। और फिर शुरू होती है अशोक गहलोत की जादूगरी  और राजीव गांधी ने निर्देश दिए थे राज्य में युवाओं की टीम बनाई जाए  फिर गहलोत ने राजेश पायलट ,  बलराम जाखड़ और रामनिवास मिर्धा  जैसे लोगों की टीम बनाई जिसको लेकर हरिदेव जोशी जो मुख्यमंत्री थे राजस्थान उन्हें चिंताएं सताने लगी। फिर दिन आया 1988 जनवरी की जब अलवर की सरिस्का उद्यान में केंद्र की मीटिंग रखी गई जिसमें राजीव गांधी ने निर्देश दिया सभी मंत्री अपने निजी वाहनों से आएंगे सरकारी तामझाम की कोई जरूरत नहीं है और राजीव गांधी ने खुद एक्सयूवी खुद ड्राइव करते हुए आ रहे थे फिर मीटिंग वाली जगह से ठीक पहले वाले चौराहे पर राजीव गांधी आए तो हवलदार ने उन्हें बाय मुड़ने का इशारा कर दिया बाय मुड़ने पर राजीव गांधी एक मैदान में जाकर रुके जहां रास्ते खत्म हो गए थे वही सरकारी वाहन का जमावड़ा लगा हुआ था सरकारी गाड़ी देखते हुए राजीव गांधी समझ गए उन से छिपाकर सरकारी अमला तैनात किया गया है यह देखते हुए राजीव गांधी ने मुख्यमंत्री जोशी को फटकारा और महीने भर के भीतर ही मुख्यमंत्री जोशी को इस्तीफा देना पड़ा था. कहां जाता है वर्तमान मुख्यमंत्री गहलोत के ही कहने पर हवलदार ने राजीव गांधी को गलत रास्ते बताए था जिससे मुख्यमंत्री जोशी को इस्तीफा देना पड़ा था।

गहलोत दिल्ली से राजस्थान लौट आए. इसके कुछ महीनों बाद 1993 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. इस समय कांग्रेस में हरिदेव जोशी, परसराम मदेरणा, शिवचरण माथुर जैसे कई खेमे सक्रिय थे. मदेरणा प्रदेश कांग्रेस कमिटी के चीफ हुआ करते थे. उनकी सदारत में कांग्रेस 1990 और 1993 के विधानसभा चुनाव हार चुकी थी. गहलोत ने उसकी कुर्सी पर नजर गढ़ा दी. साथ लिया ऐसे व्यक्ति को, कभी जिसका तख्तापलट किया था. मदेरणा की मदद से. हरिदेव जोशी. पूर्व मुख्यमंत्री. जो अब नेता प्रतिपक्ष थे.

1998 के नवंबर महीने में राजस्थान में फिर विधानसभा चुनाव हुए. तब तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पोकरण में परमाणु बम धमाके कर चुकी थी. प्याज के दाम आसमान पर थे. राजस्थान में जाट आरक्षण आंदोलन उफान पर था. अशोक गहलोत जोधपुर के सांसद और प्रदेश कांग्रेस के सदर थे. चुनाव लड़वा रहे थे. 200 में 160 विधानसभाओं में रैली की. महंगाई के नाम पर भैरो सिंह सरकार को घेरा. भैरो सिंह शेखावत राजपूत थे. जाट-राजपूत अदावत के नाम पर जाटों को भी कांग्रेस के पक्ष में साधने में कामयाब रहे. नतीजे आए तो बीजेपी का सूपड़ा साफ़ हो चुका था. 200 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस 153 सीटें जीतने में सफल रही. और फिर शुरू होती है नेता की चुनाव की प्रक्रिया कौन बनेगा राजस्थान का मुख्यमंत्री? राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने के रेस में सबसे आगे पुरानी कांग्रेसी नेता नटवर सिंह थे। लेकिन हाईकमान कुछ और चाहती थी फिर शुरू हुई विधायक दल की औपचारिक बैठक. इसके लिए तमाम विधायकों के अलावा सूबे के कांग्रेस अध्यक्ष अशोक गहलोत भी पार्टी दफ्तर पहुंचे थे. नेता का चुनाव अभी बाकी था, मगर गहलोत के चारों तरफ पुलिस का सुरक्षा घेरा जो साफ साफ दर्शा रही थी दिल्ली में बैठे हाईकमान और मैडम की इच्छा क्या है। . फिर विधायक आते और मीटिंग के लिए हॉल में घुसने से पहले उन्हें मिलते और तोहफे थमाते. कंघे से लेकर  रुमाल तक, मिठाई के डिब्बे से लेकर कलम तक. अशोक गहलोत हर चीज को एक मुस्कान के साथ स्वीकार कर रहे थे. गहलोत को मुख्यमंत्री बनाना एक सोची-समझी राजनीतिक कदम थी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए यह फैसला ली थी। उसके बाद से राजस्थान में हर पंचवर्षीय चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बदलते हैं एक बार गहलोत सरकार तो एक बार वसुंधरा राजे की सरकार आती  तो हमने देखा एक सामान्य जादूगर घर के परिवार में जन्मा एक व्यक्ति कैसे राजनीतिक गलियारों में जादू करते हुए मुख्यमंत्रि बना। अभी भी वर्तमान में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं। 




 

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