तारापीठ मंदिर: बंगाल के बीरभूम में स्थित एक ऐसा शक्तिपीठ जहां देवी को मदिरा(शराब) के भोग लगाया जाता है।




 तारापीठ मंदिर पश्चिम बंगाल राज्य की राजधानी कोलकाता से 264 किलोमीटर दूरी पर बीरभूम जिला में बहने वाली द्वारका नदी के किनारे स्थित तारापीठ गांव मैं है। इस स्थान को शक्ति पीठ के कारण जाना जाता है यह सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थल में आता है इस मंदिर में पूरे साल भक्तों की भीड़ रहती है तारादेवी मंदिर एक मध्य मध्यम आकार का मंदिर है मंदिर में देवी के कई रूपों को दर्शाया गया है तारापीठ मंदिर के कक्ष में देवी की प्रतिमा रखी गई है इसके अलावा दूसरी एक माता की धातु की प्रतिमा उनके उग्र रूप में है जिसके 4 हाथ हैं और गर्दन में मुंड की माला पहने हुए हैं उनकी जीभ बाहर हैं देवी के सिर पर चांदी की छत्री लगी हुई है तारापीठ मंदिर में प्रसाद मिलता है जिसमें उनको स्नान करवाया जाने वाला पानी सिंदूर और शराब मिलाई जाती है शराब को यहां के तांत्रिक पीते हैं वहीं से भगवान शिव का प्रसाद मानकर ग्रहण करते हैं भक्तगण भी प्रसाद में तारादेवी मां को शराब भी चढ़ाते हैं।

तारापीठ मंदिर की इतिहास के बारे में बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं जिसमें से एक है जब ऋषि वशिष्ठ तांत्रिक कला में प्रसिद्धि हासिल करना चाहते थे लेकिन अपने द्वारा किए गए तमाम प्रयत्नों के बावजूद वह हमेशा तांत्रिक कला में सिद्धि प्राप्त करने में असफल रहे। इसके बाद उनकी मुलाकात जब भगवान बुद्ध से हुई तो उन्होंने ऋषि वशिष्ठ को तारापीठ में अभ्यास करने के लिए कहा जो मां तारा की पूजा करने के लिए एक आदर्श स्थान था भगवान बुद्ध के कहने पर ऋषि वशिष्ट तारापीठ आए और पांच वर्जित चीजों के उपयोग से सिद्धि के लिए तांत्रिक अनुष्ठान और मां तारा की पूजा करने लगे इसके बाद वशिष्ठ की पूजा से प्रसन्न होकर मां तारा ने उन्हें साक्षात अपने स्वरूप का दर्शन दिया और जिसके बाद वह पत्थर की मूर्ति में बदल गई उस दिन के बाद इस मूर्ति की तारापीठ मंदिर में पूजा की जाती है

तारापीठ मंदिर से जुड़ी एक और मान्यताएं हैं एक समय बलासूर नामक एक राक्षस रहता था जो बहुत ही अत्याचारी और दुराचारी था उसके अत्याचार से तंग आकर साधु संत सभी देश छोड़ने पर बाध्य हो गए उनकी प्रार्थना सुनकर मां तारा बला सुर और उसके अनुसरण को अपने तांडव रूप दिखाना शुरू कर दिया था तब सृष्टि की रक्षा के लिए मां तारा को शांत करने के लिए स्वयं शिव जी शिशु रूप धारण कर रणभूमि में रोने लगे जैसे ही मां की उन पर नजर पड़ी वह अपनी मातृत्व को रोक ना सके और शिशु रूपी शिव को गोद में उठाकर ममता से स्तनपान करने लगी। प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है तारापीठ में मां तारा और प्रभु शिव के दर्शन प्राप्त होते हैं एक और ऐसी भी मान्यताएं हैं मां ने वशिष्ठ देव को प्रथम आकांक्षा पूरा करने के लिए स्वयं को माता रूप में दर्शन दिया थातारापीठ के महाश्मशान में एकाग्र मन से माता का ध्यान ध्यान करने से मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है तारापीठ एक महापीठ के नाम से भी जाना जाता है

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